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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 56 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 56 • ऋचा / मन्त्र 5

10.56.5

Mantra ID: 10.56.5

सहो॑भि॒र्विश्वं॒ परि॑ चक्रमू॒ रजः॒ पूर्वा॒ धामा॒न्यमि॑ता॒ मिमा॑नाः । त॒नूषु॒ विश्वा॒ भुव॑ना॒ नि ये॑मिरे॒ प्रासा॑रयन्त पुरु॒ध प्र॒जा अनु॑ ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.56.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हमारे पितरों ने अपनी शक्तियों से सारे लोकों की परिक्रमा की है तथा उन स्थानों पर गए हैं, जहां दूसरे नहीं जा पाते. उन्होंने अपने शरीर में सभी लोकों को नियमित किया है एवं प्रजाओं पर अपना प्रभुत्व अनेक प्रकार से स्थापित किया है. (५)

EN English Translation

Our pitars (ancestors) have gone all the realms with their own powers and have gone to places where others cannot go. Pitars have regularized all the realms and established their dominion over the people in many ways. (5)

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