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10.78.2
अ॒ग्निर्न ये भ्राज॑सा रु॒क्मव॑क्षसो॒ वाता॑सो॒ न स्व॒युजः॑ स॒द्यऊ॑तयः । प्र॒ज्ञा॒तारो॒ न ज्येष्ठाः॑ सुनी॒तयः॑ सु॒शर्मा॑णो॒ न सोमा॑ ऋ॒तं य॒ते ॥ (२)
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ऋग्वेद मन्त्र 10.78.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
मरुद्गण अग्नि के समान तेज से सुशोभित, स्वर्णालंकारों से युक्त वक्षःस्थल वाले, वायु के समान स्वयं मिलने वाले व शीघ्र गतिशाली, उत्तम ज्ञानियों के समान पूज्य तथा शोभन नयन एवं मुख वाले सोम के समान यज्ञ में जाते हैं. (२)
EN English Translation
Deserts go to the yagna like a som with a warm and adorned with agni, with a breast-place with golden ornaments, self-fulfilling and quick-moving, like the best wise, as the best wise, and adorned like the som with the mouth. (2)