Rigveda Quick Jump
Navigate to any Mandal or Mantra / Rik
3.26.8
त्रि॒भिः प॒वित्रै॒रपु॑पो॒द्ध्य१॒॑र्कं हृ॒दा म॒तिं ज्योति॒रनु॑ प्रजा॒नन् । वर्षि॑ष्ठं॒ रत्न॑मकृत स्व॒धाभि॒रादिद्द्यावा॑पृथि॒वी पर्य॑पश्यत् ॥ (८)
HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें
ऋग्वेद मन्त्र 3.26.8 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
अग्नि ने मन से सुंदर ज्योति को अच्छी तरह जानकर स्वयं को तीन पवित्र रूपों में शुद्ध किया. उन रूपों द्वारा स्वयं को परम रमणीय बनाया तथा इसके पश्चात् धरती और आकाश को देखा. (८)
EN English Translation
Agni purified itself in three sacred forms by knowing the beautiful light well from the mind. By those forms, he made himself most delightful and then saw the earth and the sky. (8)