Popular:
ऋग्वेद

Mandal 9 • Sukta 68 • Mantra / Rik 6

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 9 • सूक्त 68 • ऋचा / मन्त्र 6

9.68.6

Mantra ID: 9.68.6

म॒न्द्रस्य॑ रू॒पं वि॑विदुर्मनी॒षिणः॑ श्ये॒नो यदन्धो॒ अभ॑रत्परा॒वतः॑ । तं म॑र्जयन्त सु॒वृधं॑ न॒दीष्वाँ उ॒शन्त॑मं॒शुं प॑रि॒यन्त॑मृ॒ग्मिय॑म् ॥ (६)

卐

HinduText AI से इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

ऋग्वेद मन्त्र 9.68.6 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

विद्वान्‌ लोग नशीले सोम का रूप जानते हैं. बाज रूपी सोमरूप अन्न को दूर से लाई थी. भली प्रकार बढ़ने वाले, देवाभिलाषी, सभी ओर गतिशील एवं स्तुतियोग्य सोम को ऋत्विज्‌ जल में मसलते हैं. (६)

EN English Translation

The learned people know the form of the intoxicating mon. Baj rupi somrup had brought the grain from far away. The well-growing, devabhilashis, on all sides, massage the dynamic and praiseworthy mons into the ritwiz water. (6)

卐 HinduText AI