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9.86.32
स सूर्य॑स्य र॒श्मिभिः॒ परि॑ व्यत॒ तन्तुं॑ तन्वा॒नस्त्रि॒वृतं॒ यथा॑ वि॒दे । नय॑न्नृ॒तस्य॑ प्र॒शिषो॒ नवी॑यसीः॒ पति॒र्जनी॑ना॒मुप॑ याति निष्कृ॒तम् ॥ (३२)
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ऋग्वेद मन्त्र 9.86.32 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
सोम तीनों सवनों के द्वारा यज्ञ का विस्तार करते हुए अपने-आपको सूर्यकिरणों से घेरते हैं एवं यज्ञ को जानते हैं. प्रजाओं के पालक सोम यजमान की नवीन स्तुतियों को प्राप्त करते हुए शुद्ध पात्र में जाते हैं. (३२)
EN English Translation
Som, while extending the yajna through the three sawans, surrounds himself with the suryakirans and knows the yajna. Som, the guardian of the subjects, goes to the pure pot, receiving the new praises of the host. (32)