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सामवेद

Chapter / Prapathak 13 • Dashati / Sukta 1 • Mantra 2

Samaveda (सामवेद)

सामवेद • प्रपाठक / अध्याय 13 • दशती / सूक्त 1 • मन्त्र 2

13.1.2

Mantra ID: 13.1.2

अभिक्रन्दन्कलशं वाज्यर्षति पतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः । हरिर्मित्रस्य सदनेषु सीदति मर्मृजानोऽविभिः सिन्धुभिर्वृषा ॥ (२)

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सामवेद मन्त्र 13.1.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सोम! आप स्वर्गलोक के स्वामी, सैकड़ों धारा वाले, विलक्षण, स्फूर्तिदायी, ऊर्जा वर्धक व हरी आभा वाले हैं. आप आवाज करते हुए द्रोणकलश में जाते हैं. आप जल में मिल कर तैयार होते हैं. आप मित्र के घर में रहने की तरह कलश में रहते हैं. (२)

EN English Translation

O Mon! You are the swami of heaven, hundreds of streams, extraordinary, energetic, energetic and green aura. You go to Dronakalsh while making a sound. You are ready by mixing in water. You live in the urn like living in a friend's house. (2)

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