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ईशावास्योपनिषद् (ईशोपनिषद्) • अध्याय 1, मन्त्र 8

Ishavasya Upanishad (Isha) • शुक्ल यजुर्वेद (Shukla Yajurveda)

ईशावास्योपनिषद् (ईशोपनिषद्) • अध्याय 1 • मन्त्र 8

Ishavasya Upanishad (Isha) 1.8

Mantra: 1.8 [Ishopanishad_1.8]

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरँ शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 8 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस ब्रह्म के ज्ञान से शोक मोहादि की निवृत्ति होजाती है। उसके स्वरूप का अब प्रतिपादन करते हैं।

वह परमात्मा सर्वत्र व्यापक है, वह सर्व शक्तिमान् और शुक्र अर्थात् सकल जगत का उत्पादक है, वह अकाय अर्थात् स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर से रहित अतएव अव्रण अर्थात् शारीरिक विकार रहित तथा नाड़ी और नस के बन्धन से रहित है। शुद्ध अर्थात् पवित्र और पापों से रहित है, सूक्ष्मदर्शी सर्व द्रष्टा और उपदेष्टा तथा मनीषी अर्थात् सब जीवों की मनोवृत्तियों का ज्ञाता, परिभूः सर्वोपरि वर्तमान, स्वयंभूः अर्थात् अजन्मा है वही अनादि काल से सब पदार्थों को रचता है अथवा अनादि जीवों के लिये यथावत् उपदेश करता है। ॥८॥
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