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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 21

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 21

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.21

Mantra: 1.21 [Kathopanishad_1.21]

देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयमणुरेष धर्मः। अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 21 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

पूर्वकालमें इस विषयमें देवताओंको भी सन्देह हुआ था, क्योंकि यह सूक्ष्मधर्म सुगमतासे जाननेयोग्य नहीं है। हे नचिकेतः ! तू दूसरा वर माँग ले, मुझे न रोक। तू मेरे लिये यह वर छोड़ दे ॥ २१ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 देवैरप्यत्रैतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं संशयितं पुरा पूर्वं न हि सुज्ञेयं सुष्ठु ज्ञेयं श्रुतमपि प्राकृतैर्जनैरतोऽणुः सूक्ष्म एष आत्माख्यो धर्मोऽतोऽन्यमसंदिग्धफलं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मां मोपरोत्सीरुपरोधं मा कार्षीमधमर्णमिवोत्तमर्णः। अतिसृज विमुञ्च एनं वरं मा मां प्रति॥ २१॥ 【भाष्यार्थ】 इस आत्मतत्त्वके विषयमें पहले—पूर्वकालमें देवताओंने भी विचिकित्सा—संशय किया था। साधारण पुरुषोंके लिये यह तत्त्व सुने जानेपर भी सुज्ञेय—अच्छी तरह जानने योग्य नहीं है, क्योंकि यह 'आत्मा' नामवाला धर्म बड़ा ही अणु—सूक्ष्म है। अतः हे नचिकेतः! कोई दूसरा निश्चित फल देनेवाला वर माँग ले। जैसे धनी ऋणीको दबाता है उसी प्रकार तू मुझे न रोक। इस वरको तू मेरे लिये छोड़ दे॥ २१॥
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