Popular:

कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 22

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 22
नचिकेताकी स्थिरता

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.22

Mantra: 1.22 [Kathopanishad_1.22]

देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित्॥ २२॥

卐

HinduText AI से इस उपनिषद मन्त्र का ब्रह्मज्ञान समझें

उपनिषद मन्त्र संख्या 22 का आध्यात्मिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

[नचिकेता बोला—] हे मृत्यो! इस विषयमें निश्चय ही देवताओंको भी सन्देह हुआ था तथा इसे आप भी सुगमतासे जानने योग्य नहीं बतलाते। [इसीसे वह मुझे और भी अधिक अभीष्ट है] तथा इस धर्मका वक्ता भी आपके समान अन्य कोई नहीं मिल सकता और न इसके समान कोई दूसरा वर ही है ॥ २२॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 देवैरत्राप्येतस्मिन्वस्तुनि . विचिकित्सितं किलेति भवत एव नः श्रुतम्। त्वं च मृत्यो यद्यस्मान् सुज्ञेयमात्मतत्त्वमात्थ कथयसि अतः पण्डितैरप्यवेदनीयत्वाद्वक्ता 【भाष्यार्थ】 यह बात हमने अभी आपहीसे सुनी है कि इस विषयमें देवताओंने भी सन्देह किया था। और हे मृत्यो! आप भी इस आत्मतत्त्वको सुगमतासे जानने योग्य नहीं बतलाते। अतः 【शाङ्करभाष्यम्】 चास्य धर्मस्य त्वादृक्वक्तृतुल्योऽन्यः पण्डितश्च न लभ्योऽन्विष्यमाणोऽपि। अयं तु वरो निःश्रेयसप्राप्तिहेतुः। अतो नान्यो वरस्तुल्यः सदृशोऽस्त्येतस्य कश्चिदप्यनित्यफलत्वादन्यस्य सर्वस्यैवेत्यभिप्रायः ॥ २२ ॥ 【भाष्यार्थ】 पण्डितोंसे अज्ञातव्य होनेके कारण इस धर्मका कथन करनेवाला आपके समान कोई और पण्डित ढूँढ़नेसे भी नहीं मिल सकता। और यह वर भी निःश्रेयसकी प्राप्तिका कारण है। अतः इसके समान और कोई भी वर नहीं है, क्योंकि और सभी वर अनित्य फलयुक्त हैं—यह इसका अभिप्राय है ॥ २२ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 एवमुक्तोऽपि पुनः प्रलोभयन्नुवाच मृत्युः — 【भाष्यार्थ】 नचिकेताके इस प्रकार कहनेपर भी मृत्यु उसे प्रलोभित करता हुआ फिर बोला—
卐 HinduText AI