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कठोपनिषद् • वल्ली 1, मन्त्र 24

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 1 • मन्त्र 24

Katha Upanishad (Kathopanishad) 1.24

Mantra: 1.24 [Kathopanishad_1.24]

एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च। महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 24 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इसीके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे, अथवा धन और चिरस्थायिनी जीविका माँग ले। हे नचिकेताः! इस विस्तृत भूमिमें तू वृद्धिको प्राप्त हो। मैं तुझे कामनाओंको इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ॥ २४॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 एतत्तुल्यमेतेन यथोपदिष्टेन सदृशमन्यमपि यदि मन्यसे वरं तमपि वृणीष्व। किं च वित्तं प्रभूतं हिरण्यरत्नादि चिरजीविकां च सह वित्तेन वृणीष्वेत्येतत्। किं बहुना महत्यां भूमौ राजा नचिकेतस्त्वमेधि भव। किं चान्यत्कामानां दिव्यानां मानुषाणां च त्वा त्वां कामभाजं कामभागिनं कामार्हं करोमि सत्यसंकल्पो ह्यहं देवः॥ २४॥ 【भाष्यार्थ】 इस उपर्युक्त वरके समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे भी माँग ले। यही नहीं, धन अर्थात् प्रचुर सुवर्ण और रत्न आदि तथा उस धनके साथ चिरस्थायिनी जीविका भी माँग ले। अधिक क्या, हे नचिकेतः! इस विस्तृत भूमिमें तू राजा होकर वृद्धिको प्राप्त हो। और तो क्या, मैं तुझे दैवी और मानुषी सभी कामनाओंका कामभागी अर्थात् इच्छानुसार भोगनेवाला किये देता हूँ, क्योंकि मैं सत्य-संकल्प देवता हूँ॥ २४॥
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