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कठोपनिषद् • वल्ली 3, मन्त्र 10

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 3 • मन्त्र 10
इन्द्रियादिका तारतम्य

Katha Upanishad (Kathopanishad) 3.10

Mantra: 3.10 [Kathopanishad_3.10]

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महानपरः ॥ १० ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 10 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इन्द्रियोंकी अपेक्षा उनके विषय श्रेष्ठ हैं, विषयोंसे मन उत्कृष्ट है,
मनसे बुद्धि पर है और बुद्धिसे भी महान् आत्मा (महत्तत्त्व) उत्कृष्ट
है ॥ १० ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 स्थूलानि तावदिन्द्रियाणि तानि यैरर्थात्मप्रकाशनाय आरब्धानि तेभ्य इन्द्रियेभ्यः स्वकार्येभ्यस्ते परा ह्यर्थाः सूक्ष्मा महान्तश्च प्रत्यगात्मभूताश्च । तेभ्योऽप्यर्थेभ्यश्च परं सूक्ष्मतरं महत्प्रत्यगात्मभूतं च मनः । मनः- शब्दवाच्यं मनस आरम्भकं भूतसूक्ष्मं 【भाष्यार्थ】 इन्द्रियाँ तो स्थूल हैं। वे जिन शब्द- स्पर्शादि विषयोंद्वारा अपनेको प्रकाशित करनेके लिये बनायी गयी हैं वे विषय अपने कार्यभूत इन्द्रियवर्गसे पर—सूक्ष्म, महान् एवं प्रत्यगात्मस्वरूप हैं । उन विषयोंसे भी पर—सूक्ष्म, महान् तथा प्रत्यगात्मस्वरूपभूत मन है, जो कि 'मन' शब्दका वाच्य और मनका आरम्भक भूतसूक्ष्म है, क्योंकि 【शाङ्करभाष्यम्】 संकल्पविकल्पाद्यारम्भकत्वात्। मनसोऽपि परा सूक्ष्मतरा महत्तरा प्रत्यगात्मभूता च बुद्धिः, बुद्धिशब्दवाच्यमध्यवसायाद्यारम्भकं भूतसूक्ष्मम्। बुद्धेरात्मा सर्वप्राणिबुद्धीनां प्रत्यगात्मभूतत्वादात्मा महान्सर्वमहत्त्वात्। अव्यक्तात्प्रथमं जातं हैरण्यगर्भ तत्त्वं बोधाबोधात्मकं महानात्मा बुद्धेः पर इत्युच्यते॥ १०॥ 【भाष्यार्थ】 वही सङ्कल्प-विकल्पादिका आरम्भक है। मनसे भी पर—सूक्ष्मतर, महत्तर एवं प्रत्यगात्मभूत 'बुद्धि' शब्दवाच्य अध्यवसायादिका आरम्भक भूतसूक्ष्म है। उस बुद्धिसे भी, सम्पूर्ण प्राणियोंकी बुद्धिका प्रत्यगात्मभूत होनेसे आत्मा महान् है, क्योंकि वह सबसे बड़ा है। अर्थात् अव्यक्तसे जो सबसे पहले उत्पन्न हुआ हिरण्यगर्भ तत्त्व है, जो महान् आत्मा [ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्तिसे सम्पन्न होनेके कारण] बोधाबोधात्मक है वह बुद्धिसे भी पर है—ऐसा कहा जाता है॥ १०॥
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