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Katha Upanishad (Kathopanishad) 3.17
य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ॥ तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥
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उपनिषद मन्त्र संख्या 17 का आध्यात्मिक रहस्य