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कठोपनिषद् • वल्ली 3, मन्त्र 17

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 3 • मन्त्र 17

Katha Upanishad (Kathopanishad) 3.17

Mantra: 3.17 [Kathopanishad_3.17]

य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ॥ तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 17 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो पुरुष इस परमगुह्य ग्रन्थको पवित्रतापूर्वक ब्राह्मणोंकी सभामें अथवा श्राद्धकालमें सुनाता है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला होता है, अनन्त फलवाला होता है ॥ १७ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 यः कश्चिदिमं ग्रन्थं परमं प्रकृष्टं गुह्यं गोप्यं श्रावयेद्ग्रन्थतोऽर्थतश्च ब्राह्मणानां संसदि ब्रह्मसंसदि प्रयतः शुचिर्भूत्वा श्राद्धकाले वा श्रावयेद्भुञ्जानानां तच्छ्राद्धमस्यानन्त्यायानन्तफलाय कल्पते सम्पद्यते । द्विर्वचनम् अध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् ॥ १७ ॥ 【भाष्यार्थ】 जो कोई पुरुष इस परम—प्रकृष्ट और गुह्य—गोपनीय ग्रन्थको पवित्र होकर ब्राह्मणोंकी सभामें अथवा श्राद्धकालमें—भोजन करनेके लिये बैठे हुए ब्राह्मणोंके प्रति केवल पाठमात्र या अर्थ करते हुए सुनाता है उसका वह श्राद्ध अनन्त फलवाला होता है । यहाँ अध्यायकी समाप्तिके लिये ‘तदानन्त्याय कल्पते’ यह वाक्य दो बार कहा गया है ॥ १७ ॥
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