Popular:

कठोपनिषद् • वल्ली 4, मन्त्र 1

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 4 • मन्त्र 1
आत्मदर्शनका विघ्न—इन्द्रियोंकी बहिर्मुखता

Katha Upanishad (Kathopanishad) 4.1

Mantra: 4.1 [Kathopanishad_4.1]

पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भू- स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्। कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥

卐

HinduText AI से इस उपनिषद मन्त्र का ब्रह्मज्ञान समझें

उपनिषद मन्त्र संख्या 1 का आध्यात्मिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

स्वयम्भू (परमात्मा)-ने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है। इसीसे जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं। जिसने अमृतत्वकी इच्छा करते हुए अपनी इन्द्रियोंको रोक लिया है ऐसा कोई धीर पुरुष ही प्रत्यगात्माको देख पाता है ॥ १ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 पराञ्चि परागञ्चन्ति गच्छन्तीति खानि तदुपलक्षितानि श्रोत्रादीनीन्द्रियाणि खानीत्युच्यन्ते। तानि पराञ्च्येव शब्दादिविषयप्रकाशनाय प्रवर्तन्ते। यस्मादेवं स्वाभाविकानि तानि व्यतृणद्धिंसितवान् हननं कृतवान् इत्यर्थः। कोऽसौ ? स्वयम्भूः परमेश्वरः स्वयमेव स्वतन्त्रो भवति सर्वदा न परतन्त्र इति। तस्मात्पराङ् पराग्रूपानात्मभूताञ्शब्दादीन्पश्यत्युपलभत उपलब्धा, नान्तरात्मान्नान्तरात्मानमित्यर्थः। 【शाङ्करभाष्यम्】 एवं स्वभावेऽपि सति लोकस्य कश्चिच्छ्रद्धाः प्रतिस्रोतःप्रवर्तनमिव धीरो धीमान्विवेकी प्रत्यगात्मानं प्रत्यक्चासावात्मा चेति प्रत्यगात्मा। प्रतीच्येवात्मशब्दो रूढो लोके 【भाष्यार्थ】 जो पराक् अर्थात् बाहरकी ओर अञ्चन करती—गमन करती हैं उन्हें 'पराञ्चि' (बाहर जानेवाली) कहते हैं। 'ख' छिद्रोंको कहते हैं, उनसे उपलक्षित श्रोत्रादि इन्द्रियाँ 'खानि'* नामसे कही गयी हैं। वे बहिर्मुख होकर ही शब्दादि विषयोंको प्रकाशित करनेके लिये प्रवृत्त हुआ करती हैं। क्योंकि वे स्वभावसे ही ऐसी हैं इसलिये उन्हें हिंसित कर दिया है—उनका हनन कर दिया है। वह [हनन करनेवाला] कौन है? स्वयम्भू—परमेश्वर अर्थात् जो स्वतः ही सर्वदा स्वतन्त्र रहता है—परतन्त्र नहीं रहता। इसलिये वह उपलब्धा सर्वदा पराक् अर्थात् बहिःस्वरूप अनात्मभूत शब्दादि विषयोंको ही देखता—उपलब्ध करता है, 'नान्तरात्मन्' अर्थात् अन्तरात्माको नहीं। 【भाष्यार्थ】 यद्यपि लोकका ऐसा ही स्वभाव है तो भी कोई धीर—बुद्धिमान्—विवेकी पुरुष ही नदीको उसके प्रवाहके विपरीत दिशामें फेर देनेके समान [इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटाकर] उस अपने प्रत्यगात्माको [देखता है]। जो प्रत्यक् (सम्पूर्ण विषयोंको जाननेवाला) हो और आत्मा भी हो उसे प्रत्यगात्मा कहते हैं। लोकमें 【भाष्यार्थ】 * नपुंसक 'ख' शब्दका प्रथमा-बहुवचन। 【शाङ्करभाष्यम्】 नान्यस्मिन् । व्युत्पत्तिपक्षेऽपि तत्रैवात्मशब्दो वर्तते । 【शाङ्करभाष्यम्】 इत्यात्मशब्दव्युत्पत्तिस्मरणात् । तं प्रत्यगात्मानं स्वं स्वभावमैक्षदपश्यत्पश्यतीत्यर्थः, छन्दसि कालानियमात् । कथं पश्यतीत्युच्यते । आवृत्तचक्षुरावृत्तं व्यावृत्तं चक्षुः श्रोत्रादिकमिन्द्रियजातम् अशेषविषयेभ्यः स आवृत्तचक्षुः । स एवं संस्कृतः प्रत्यगात्मानं पश्यति । न हि बाह्यविषयालोचनपरत्वं प्रत्यगात्मेक्षणं चैकस्य सम्भवति । किमर्थं पुनरित्थं महता प्रयासेन 【भाष्यार्थ】 आत्मा शब्द 'प्रत्यक्' के अर्थमें ही रूढ है, और किसी अर्थमें नहीं। व्युत्पत्तिपक्षमें भी 'आत्मा' शब्दकी प्रवृत्ति उसी (प्रत्यक्-अर्थ ही)-में है जैसा कि “क्योंकि यह सबको व्याप्त करता है, ग्रहण करता है और इस लोकमें विषयोंको भोगता है तथा इसका सर्वदा सद्भाव है इसलिये यह 'आत्मा' कहलाता है” इस प्रकार आत्मा शब्दकी व्युत्पत्तिके सम्बन्धमें स्मृति है । उस प्रत्यगात्माको अर्थात् अपने स्वरूपको 'ऐक्षत्' — देखा यानी देखता है । वैदिक प्रयोगमें कालका नियम न होनेके कारण यहाँ वर्तमान कालके अर्थमें भूतकालकी क्रिया [ऐक्षत् ] — का प्रयोग हुआ है। वह किस प्रकार देखता है ? इसपर कहते हैं—'आवृत्तचक्षुः' अर्थात् जिसने अपनी चक्षु और श्रोत्रादि इन्द्रियसमुहको सम्पूर्ण विषयोंसे व्यावृत्त कर लिया है—लौटा लिया है, वह इस प्रकार संस्कारयुक्त हुआ पुरुष ही उस प्रत्यगात्माको देख पाता है । एक ही पुरुषके लिये बाह्य विषयोंकी आलोचनामें तत्पर रहना तथा प्रत्यगात्माका साक्षात्कार करना—ये दोनों बातें सम्भव नहीं हैं । 'अच्छा, तो, इस प्रकार महान् 【शाङ्करभाष्यम्】 स्वभावप्रवृत्तिनिरोधं कृत्वा धीरः प्रत्यगात्मानं पश्यति इत्युच्यते; अमृतत्वममरणधर्मत्वं नित्य- स्वभावतामिच्छन् आत्मन इत्यर्थः ॥ १ ॥ 【भाष्यार्थ】 परिश्रमसे [इन्द्रियोंकी] स्वाभाविक प्रवृत्तिको रोककर धीर पुरुष प्रत्य- गात्माको क्यों देखता है?' ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं—'अमृतत्व— अमरणधर्मत्व अर्थात् आत्माकी नित्यस्वभावताकी इच्छा करता हुआ [उसे देखता है]'॥ १ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 यत्तावत्स्वाभाविकं परागेव अनात्मदर्शनं तदात्मदर्शनस्य प्रतिबन्धकारणमविद्या तत्प्रति- कूलत्वात् । या च पराक्ष्वेवाविद्योप- प्रदर्शिताेषु दृष्टादृष्टेषु भोगेषु तृष्णा ताभ्यामविद्यातृष्णाभ्यां प्रतिबद्धात्मदर्शनाः— 【भाष्यार्थ】 जो स्वभावसे ही बाह्य अनात्मदर्शन है वही आत्मदर्शनके प्रतिबन्धकी कारणरूपा अविद्या है, क्योंकि वह उस (आत्मदर्शन)-के प्रतिकूल है । इसके सिवा अविद्यासे दिखलायी देनेवाले दृष्ट और अदृष्ट बाह्य भोगोंमें जो तृष्णा है उन अविद्या और तृष्णा दोनोंहीसे जिनका आत्मदर्शन प्रतिबद्ध हो रहा है वे—
卐 HinduText AI