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Katha Upanishad (Kathopanishad) 4.1
पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भू- स्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्। कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥
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