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केनोपनिषद् • खण्ड 1, मन्त्र 4

Kena Upanishad • सामवेद (Samaveda - Talavakara Brahmana)

केनोपनिषद् • खण्ड 1 • मन्त्र 4

Kena Upanishad 1.4

Mantra: 1.4 [Kenopanishad_1.4]

यद्वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥४॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 4 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जो ब्रह्म वाणी द्वारा प्रकाशित नहीं हो सकता, अपितु जिसकी शक्ति से वाणी बोलती है, उसी को तुम्हें ब्रह्म समझना चाहिए, तर्क द्वारा जिसे सिद्ध किया जाता है अथवा जिसकी उपासना की जाती है वह ब्रह्म नहीं है। क्योंकि तर्क की शक्ति तो चक्षु और बुद्धि तक ही सीमित है, जो वस्तु बुद्धि की समझ से भी परे है वहां तर्क क्या करेगा। वाणी प्रत्येक दृश्य और परिच्छिन्न वस्तु का वर्णन कर सकती है परन्तु ब्रह्म न परिच्छिन्न है न साकार है फिर वाणी किसका निर्देश करे, इसलिये ब्रह्म वही है जिसने वाणी की रचना की है किन्तु वाणी उसे कह नहीं सकती।

क्या मनसे उसका मनन नहीं किया जा सकता ? उत्तर–नहीं । ॥४॥
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