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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 117 • Mantra / Rik 12

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 117 • ऋचा / मन्त्र 12

1.117.12

Mantra ID: 1.117.12

कुह॒ यान्ता॑ सुष्टु॒तिं का॒व्यस्य॒ दिवो॑ नपाता वृषणा शयु॒त्रा । हिर॑ण्यस्येव क॒लशं॒ निखा॑त॒मुदू॑पथुर्दश॒मे अ॑श्वि॒नाह॑न् ॥ (१२)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.117.12 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सूर्यपुत्र एवं कामवर्षक अश्चिनीकुमारो! तुम किस निवासस्थान में वर्तमान काव्य की शोभन स्तुति सुनने जाते हो? जिस प्रकार सोने से भरे एवं धरती में गड़े कलश को कोई जानकार ही निकालता है, उसी प्रकार तुमने कुएं में पड़े रेभ ऋषि को दसवें दिन बाहर निकाला था. (१२)

EN English Translation

O son of the sun and the working aschinikumaro! In which place do you go to hear the praise of the present poem? Just as only someone knows the kalash filled with gold and buried in the earth, so you brought out the sage Rebh lying in the well on the tenth day. (12)

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