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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 140 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 140 • ऋचा / मन्त्र 3

1.140.3

Mantra ID: 1.140.3

कृ॒ष्ण॒प्रुतौ॑ वेवि॒जे अ॑स्य स॒क्षिता॑ उ॒भा त॑रेते अ॒भि मा॒तरा॒ शिशु॑म् । प्रा॒चाजि॑ह्वं ध्व॒सय॑न्तं तृषु॒च्युत॒मा साच्यं॒ कुप॑यं॒ वर्ध॑नं पि॒तुः ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.140.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अग्नि की माता के समान काले दोनों काष्ठ जलते हैं एवं समान कार्य करते हुए अग्नि को उस प्रकार प्राप्त करते हैं, जिस प्रकार माता शिशु को. वह शिशु रूप अग्ने पूर्वाभिमुख, जिह्वा वाला, तम विनाशक, शीघ्र उत्पन्न काष्ठ से शनै:-शनैः मिलने वाला, रक्षणीय एवं पालक यजमान का वर्द्धक है. (३)

EN English Translation

Like the mother of fire, both the woods burn and do the same work and get the fire in the same way as the mother and the baby. The infant form is facing east, tongue-in-cheek, most destructive, quick-to-produce wood. (3)

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