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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 168 • Mantra / Rik 6

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 168 • ऋचा / मन्त्र 6

1.168.6

Mantra ID: 1.168.6

क्व॑ स्विद॒स्य रज॑सो म॒हस्परं॒ क्वाव॑रं मरुतो॒ यस्मि॑न्नाय॒य । यच्च्या॒वय॑थ विथु॒रेव॒ संहि॑तं॒ व्यद्रि॑णा पतथ त्वे॒षम॑र्ण॒वम् ॥ (६)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.168.6 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मरुतो! उस विशाल वर्षा जल का आदि और अंत कहां है? जिसे बरसाने के लिए तुम जिस समय ढीली घास के समान जल को बिखराते हो, उस समय तेजस्वी बादल को वज्र द्वारा टुकड़े-टुकड़े कर देते हो. (६)

EN English Translation

O Maruto! Where is the beginning and end of that huge rainwater? To rain which you break the water like loose grass, you break the bright cloud to pieces with thunderbolt at that time. (6)

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