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ऋग्वेद

Mandal 1 • Sukta 45 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 1 • सूक्त 45 • ऋचा / मन्त्र 2

1.45.2

Mantra ID: 1.45.2

श्रु॒ष्टी॒वानो॒ हि दा॒शुषे॑ दे॒वा अ॑ग्ने॒ विचे॑तसः । तान्रो॑हिदश्व गिर्वण॒स्त्रय॑स्त्रिंशत॒मा व॑ह ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 1.45.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अग्नि! विशेष बुद्धि वाले देवता हव्य देने वाले यजमान को फल देते हैं. हे रोहित अश्व के स्वामी एवं स्तुतिपात्र अग्नि! तुम तेतीस देवों को यहां ले आओ. (२)

EN English Translation

O agni! The gods with special intellects give fruit to the host who gives the havan. O Rohita, lord of the horse and the praiseworthy agni! Bring thirty-three gods here. (2)

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