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ऋग्वेद

Mandal 10 • Sukta 66 • Mantra / Rik 13

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 10 • सूक्त 66 • ऋचा / मन्त्र 13

10.66.13

Mantra ID: 10.66.13

दैव्या॒ होता॑रा प्रथ॒मा पु॒रोहि॑त ऋ॒तस्य॒ पन्था॒मन्वे॑मि साधु॒या । क्षेत्र॑स्य॒ पतिं॒ प्रति॑वेशमीमहे॒ विश्वा॑न्दे॒वाँ अ॒मृता॒ँ अप्र॑युच्छतः ॥ (१३)

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ऋग्वेद मन्त्र 10.66.13 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

पुरोहितों में प्रमुख व देवों को बुलाने वाले अग्नि एवं आदित्य की सेवा मैं हव्य द्वारा करता हूं एवं विघ्नरहित होकर यज्ञमार्ग का अनुगमन करता हूं. मैं अपने समीपवर्ती, क्षेत्रपति, मरणरहित एवं प्रमादरहित सभी देवों से याचना करता हूं. (१३)

EN English Translation

I serve Agni and Aditya, the chief among the priests and those who call the gods, through Havya and follow the path of yajna without hindrance. I beseech all my near, regionalist, deathless and unpretentious gods. (13)

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