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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 16 • Mantra / Rik 14

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 16 • ऋचा / मन्त्र 14

4.16.14

Mantra ID: 4.16.14

सूर॑ उपा॒के त॒न्वं१॒॑ दधा॑नो॒ वि यत्ते॒ चेत्य॒मृत॑स्य॒ वर्पः॑ । मृ॒गो न ह॒स्ती तवि॑षीमुषा॒णः सिं॒हो न भी॒म आयु॑धानि॒ बिभ्र॑त् ॥ (१४)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.16.14 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मरणरहित इंद्र! जब तुम सूर्य के समीप शरीर धारण करते हो, तब तुम्हारा रूप सुशोभित होता है. तुम हाथी के समान शत्रुओं की सेना जलाते हुए आयुध धारण करते हो एवं शेर के समान भयंकर हो. (१४)

EN English Translation

O indra without death! When you take a body near the sun, your form is adorned. You wear armaments while burning the army of enemies like an elephant and are as fierce as a lion. (14)

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