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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 38 • Mantra / Rik 7

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 38 • ऋचा / मन्त्र 7

4.38.7

Mantra ID: 4.38.7

उ॒त स्य वा॒जी सहु॑रिरृ॒तावा॒ शुश्रू॑षमाणस्त॒न्वा॑ सम॒र्ये । तुरं॑ य॒तीषु॑ तु॒रय॑न्नृजि॒प्योऽधि॑ भ्रु॒वोः कि॑रते रे॒णुमृ॒ञ्जन् ॥ (७)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.38.7 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

दधिक्रा देव इस प्रकार के घोड़ों के समान युद्ध में सहनशील, शत्रुओं के अन्न पर अधिकार करने वाले, अपने अंगों से ही अपनी सेवा करने वाले, सीधे चलने वाले, असुर सेनाओं में वेगपूर्ण, धूल उड़ाने वाले एवं उस धूल को अपनी ही भौंहों पर गिराने वाले हैं. (७)

EN English Translation

The Dadhidra Dev is tolerant of war like this type of horses, who possesses the food of the enemies, who serves himself with his own limbs, who walks straight, is swift in the asura armies, who blows the dust, and who is going to drop that dust on his own eyebrows. (7)

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