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ऋग्वेद

Mandal 4 • Sukta 45 • Mantra / Rik 6

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 4 • सूक्त 45 • ऋचा / मन्त्र 6

4.45.6

Mantra ID: 4.45.6

आ॒के॒नि॒पासो॒ अह॑भि॒र्दवि॑ध्वतः॒ स्व१॒॑र्ण शु॒क्रं त॒न्वन्त॒ आ रजः॑ । सूर॑श्चि॒दश्वा॑न्युयुजा॒न ई॑यते॒ विश्वा॒ँ अनु॑ स्व॒धया॑ चेतथस्प॒थः ॥ (६)

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ऋग्वेद मन्त्र 4.45.6 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

किरणें दिवस के द्वारा अंधकार को नष्ट करती हुई सूर्य के समान उज्ज्वल तेज का विस्तार करती हैं. हे अश्विनीकुमारो! सूर्य अपने रथ में घोड़े जोड़कर चलते हैं. तुम दोनों सोमरस लेकर चलते हुए उनका रास्ता बताओ. (६)

EN English Translation

The rays extend as bright a bright glow as the sun destroying the darkness by day. O Ashwinikumaro! The sun walks by adding horses to its chariot. You both take the somras and tell them their way. (6)

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