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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 43 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 43 • ऋचा / मन्त्र 5

5.43.5

Mantra ID: 5.43.5

असा॑वि ते जुजुषा॒णाय॒ सोमः॒ क्रत्वे॒ दक्षा॑य बृह॒ते मदा॑य । हरी॒ रथे॑ सु॒धुरा॒ योगे॑ अ॒र्वागिन्द्र॑ प्रि॒या कृ॑णुहि हू॒यमा॑नः ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.43.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे सेवा करने वाले इंद्र! तुम्हारे कार्यो, शक्ति एवं महान्‌ मद के कारण तुम्हारे लिए सोमरस निचोड़ा गया है. हे इंद्र! हमारे द्वारा पुकारे जाने पर तुम सुंदर जुए में जुते हुए दोनों घोड़ों को रथ में जोड़कर वह रथ हमारे सामने लाओ. (५)

EN English Translation

O you who serve Indra! The Somras has been squeezed out for you because of your actions, power and greatness. O Indra! When we call out by us, you join the two horses in the chariot while gambling in beautiful gambling and bring that chariot in front of us. (5)

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