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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 44 • Mantra / Rik 1

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 44 • ऋचा / मन्त्र 1

5.44.1

Mantra ID: 5.44.1

तं प्र॒त्नथा॑ पू॒र्वथा॑ वि॒श्वथे॒मथा॑ ज्ये॒ष्ठता॑तिं बर्हि॒षदं॑ स्व॒र्विद॑म् । प्र॒ती॒ची॒नं वृ॒जनं॑ दोहसे गि॒राशुं जय॑न्त॒मनु॒ यासु॒ वर्ध॑से ॥ (१)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.44.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अंतरात्मा! पुराने यजमान, हमारे पूर्वज, समस्त प्राणी एवं आधुनिक लोग जिस प्रकार देवों में श्रेष्ठ, कुश पर विराजने वाले, सर्वज्ञ, हमारे सामने उपस्थित, शक्तिशाली, शीघ्रगामी एवं सबको हराने वाले इंद्र की स्तुति करके सफल मनोरथ हुए थे, उसी प्रकार तुम भी बनो. (१)

EN English Translation

O conscience! Just as the old hosts, our ancestors, all beings and modern people were successful by praising indra, the best of the gods, the one who ascended to kusha, the all-knowing, the one before us, the mighty, the quick and the defeater, so be you. (1)

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