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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 44 • Mantra / Rik 3

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 44 • ऋचा / मन्त्र 3

5.44.3

Mantra ID: 5.44.3

अत्यं॑ ह॒विः स॑चते॒ सच्च॒ धातु॒ चारि॑ष्टगातुः॒ स होता॑ सहो॒भरिः॑ । प्र॒सर्स्रा॑णो॒ अनु॑ ब॒र्हिर्वृषा॒ शिशु॒र्मध्ये॒ युवा॒जरो॑ वि॒स्रुहा॑ हि॒तः ॥ (३)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.44.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अग्नि सत्य, फलसाधक एवं सबको धारण करने वाले हव्य को सदा स्वीकार करते हैं. अग्नि बाधाहीन गति वाले, होम-निष्पादक एवं शक्तिदाता हैं. वे कुशों पर बैठने वाले, वर्षाकारी, ओषधियों में स्थित, शिशु, युवा एवं जरारहित हैं. (३)

EN English Translation

Fire always accepts the truth, the fruit-giver and the one who possesses all of them. Fires are non-barrier-prone, home-executing and power-giver. They are seated on the kushas, rain-fed, nestled, infantile, young and uninhibited. (3)

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