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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 47 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 47 • ऋचा / मन्त्र 2

5.47.2

Mantra ID: 5.47.2

अ॒जि॒रास॒स्तद॑प॒ ईय॑माना आतस्थि॒वांसो॑ अ॒मृत॑स्य॒ नाभि॑म् । अ॒न॒न्तास॑ उ॒रवो॑ वि॒श्वतः॑ सीं॒ परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी य॑न्ति॒ पन्थाः॑ ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.47.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अपरिमित, व्याप्त एवं प्रकाशनरूप कर्म करती हुई सूर्यकिरणें सूर्य मंडल के साथ एकत्र होकर स्वर्ग, धरती एवं आकाश में गतिशील होती हैं. (२)

EN English Translation

The sun-rays, which are infinite, pervasive and perform enlightening deeds, move together with the solar system and move in heaven, earth and sky. (2)

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