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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 48 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 48 • ऋचा / मन्त्र 4

5.48.4

Mantra ID: 5.48.4

ताम॑स्य री॒तिं प॑र॒शोरि॑व॒ प्रत्यनी॑कमख्यं भु॒जे अ॑स्य॒ वर्प॑सः । सचा॒ यदि॑ पितु॒मन्त॑मिव॒ क्षयं॒ रत्नं॒ दधा॑ति॒ भर॑हूतये वि॒शे ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.48.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

अपने स्वामी का अभिमत पूरा करने वाले परशु के समान हम अग्नि की दीप्ति को देखते हैं. इस रूपवान्‌ सूर्य की किरणों का वर्णन हम सुख पाने के निमित्त करते हैं. अग्नि देव हमारे सहायक होकर यज्ञशाला में आते हैं एवं यजमान को अन्न से भरा हुआ घर तथा उत्तम धन देते हैं. (४)

EN English Translation

Like Parshu, who fulfills the opinion of his master, we see the glow of agni. We describe the rays of this forming sun for the sake of happiness. The agni god comes to the yajnashala as our helper and gives the host a house full of food and good wealth. (4)

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