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ऋग्वेद

Mandal 5 • Sukta 66 • Mantra / Rik 2

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 5 • सूक्त 66 • ऋचा / मन्त्र 2

5.66.2

Mantra ID: 5.66.2

ता हि क्ष॒त्रमवि॑ह्रुतं स॒म्यग॑सु॒र्य१॒॑माशा॑ते । अध॑ व्र॒तेव॒ मानु॑षं॒ स्व१॒॑र्ण धा॑यि दर्श॒तम् ॥ (२)

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ऋग्वेद मन्त्र 5.66.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मित्र व वरुण! तुम्हारी शक्ति असुर विनाशिनी एवं विरोधरहित है. तुम्हारा महान्‌ बल व्याप्त है. सूर्य जैसे आकाश में दीखता है, वैसे ही तुम अपनी दर्शनीय शक्ति यज्ञ में स्थापित करो. (२)

EN English Translation

Oh my friend and Varun! Your power is asura destructive and non-opposition. Your great power is pervaded. As the sun appears in the sky, so do you set your visible power in the yajna. (2)

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