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ऋग्वेद

Mandal 6 • Sukta 18 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 6 • सूक्त 18 • ऋचा / मन्त्र 5

6.18.5

Mantra ID: 6.18.5

तन्नः॑ प्र॒त्नं स॒ख्यम॑स्तु यु॒ष्मे इ॒त्था वद॑द्भिर्व॒लमङ्गि॑रोभिः । हन्न॑च्युतच्युद्दस्मे॒षय॑न्तमृ॒णोः पुरो॒ वि दुरो॑ अस्य॒ विश्वाः॑ ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 6.18.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे दृढ़ पर्वतों को गिराने वाले एवं दर्शनीय इंद्र! तुम्हारे साथ हमारी मित्रता चिरकाल तक रहे. तुमने स्तुतिकर्ता अंगिरागोत्रीय ऋषियों के ऊपर शस्त्र चलाने वाले बल नामक असुर को मारा एवं उसके सभी नगरों तथा उनके द्वारों को नष्ट कर दिया. (५)

EN English Translation

O Indra, who has fallen the mountains and is visible! May our friendship with you last forever. You struck the asura, the force that used arms against the sages of the praise-giving English sages, and destroyed all its cities and their gates. (5)

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