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ऋग्वेद

Mandal 6 • Sukta 44 • Mantra / Rik 15

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 6 • सूक्त 44 • ऋचा / मन्त्र 15

6.44.15

Mantra ID: 6.44.15

पाता॑ सु॒तमिन्द्रो॑ अस्तु॒ सोमं॒ हन्ता॑ वृ॒त्रं वज्रे॑ण मन्दसा॒नः । गन्ता॑ य॒ज्ञं प॑रा॒वत॑श्चि॒दच्छा॒ वसु॑र्धी॒नाम॑वि॒ता का॒रुधा॑याः ॥ (१५)

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ऋग्वेद मन्त्र 6.44.15 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

इंद्र इस निचोड़े हुए सोमरस को पिएं एवं प्रसन्न होकर वज्र द्वारा वृत्र को मारें. सबको घर देने वाले, स्तोताओं के यज्ञकर्म के रक्षक एवं यजमानों के पालक इंद्र दूर देश से भी हमारे यज्ञ में आवें. (१५)

EN English Translation

Indra drinks this squeezed somras and be happy to kill Vritra with a thunderbolt. Indra, the protector of the yagnakarma of the hymns and the guardian of the hosts, may come to our yajna even from a distant land. (15)

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