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ऋग्वेद

Mandal 7 • Sukta 61 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 7 • सूक्त 61 • ऋचा / मन्त्र 5

7.61.5

Mantra ID: 7.61.5

अमू॑रा॒ विश्वा॑ वृषणावि॒मा वां॒ न यासु॑ चि॒त्रं ददृ॑शे॒ न य॒क्षम् । द्रुहः॑ सचन्ते॒ अनृ॑ता॒ जना॑नां॒ न वां॑ नि॒ण्यान्य॒चिते॑ अभूवन् ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 7.61.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे मूढ़तारहित, व्यापक एवं अभिलाषापूरक मित्र व वरुण! तुम्हारी स्तुतियों में आश्चर्य एवं आदर दिखाई नहीं देता. अर्थात्‌ तुम्हारी स्तुतियां सच्ची हैं. लोगों की झूठी स्तुति तुम्हारे शत्रु स्वीकार करते हैं. तुम्हारे प्रति किए गए स्तोत्र रहस्यपूर्ण होते हुए भी अज्ञान के कारण न बनें. (५)

EN English Translation

O foolless, comprehensive and wishful friend and Varuna! There is no wonder and respect in your praises. That is, your praises are true. Your enemies accept the false praise of the people. Do not be for ignorance even though the hymns made to you are mysterious. (5)

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