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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 23 • Mantra / Rik 4

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 23 • ऋचा / मन्त्र 4

8.23.4

Mantra ID: 8.23.4

उद॑स्य शो॒चिर॑स्थाद्दीदि॒युषो॒ व्य१॒॑जर॑म् । तपु॑र्जम्भस्य सु॒द्युतो॑ गण॒श्रियः॑ ॥ (४)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.23.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

भली प्रकार दीप्तिशाली, तापदाता दाढ़ वाले, शोभन दीप्तियुक्त एवं यजमानों का आश्रय लेने वाले अग्नि का जरारहित तेज उठता है. (४)

EN English Translation

The agni that is well-lit, with a warm molar, a warm-hearted and sheltering host, rises without a bit of agni. (4)

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