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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 44 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 44 • ऋचा / मन्त्र 5

8.44.5

Mantra ID: 8.44.5

उप॑ त्वा जु॒ह्वो॒३॒॑ मम॑ घृ॒ताची॑र्यन्तु हर्यत । अग्ने॑ ह॒व्या जु॑षस्व नः ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.44.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अभिलाषा करने वाले अग्नि! मेरा घृत धारण करने वाला खुच तुम्हारे पास जावे. तुम हमारे हव्यों को स्वीकार करो. (५)

EN English Translation

O agni that desires! Let the one who wears my disgust go to you. You accept our words. (5)

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