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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 45 • Mantra / Rik 30

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 45 • ऋचा / मन्त्र 30

8.45.30

Mantra ID: 8.45.30

यः कृ॒न्तदिद्वि यो॒न्यं त्रि॒शोका॑य गि॒रिं पृ॒थुम् । गोभ्यो॑ गा॒तुं निरे॑तवे ॥ (३०)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.45.30 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिन इंद्र ने त्रिलोक ऋषि की प्रार्थना पर जल निकलने के द्वार समान एवं विस्तृत मेघ को विच्छिन्न किया था, उन्हीं जलों के निकलने के लिए मार्ग बनाया था. (३०)

EN English Translation

Indra, who had dissected the uniform and wide cloud of water at the prayer of sage Trilok, had made a way for the same water to come out. (30)

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