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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 47 • Mantra / Rik 15

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 47 • ऋचा / मन्त्र 15

8.47.15

Mantra ID: 8.47.15

नि॒ष्कं वा॑ घा कृ॒णव॑ते॒ स्रजं॑ वा दुहितर्दिवः । त्रि॒ते दु॒ष्ष्वप्न्यं॒ सर्व॑मा॒प्त्ये परि॑ दद्मस्यने॒हसो॑ व ऊ॒तयः॑ सुऊ॒तयो॑ व ऊ॒तयः॑ ॥ (१५)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.47.15 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे स्वर्ग की पुत्री उषा! आभरण बनाने वाले सुनार अथवा माला बनाने वाले का जो दुःख है वह मुझ आप्त्यत्रित के पास से दूर चला जावे. तुम्हारी रक्षा उपद्रवरहित एवं शोभन है. (१५)

EN English Translation

O daughter of heaven Usha! Let the sorrow of the goldsmith or the garland maker who makes the filler go away from me. Your defense is hassle-free and adorning. (15)

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