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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 50 • Mantra / Rik 6

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 50 • ऋचा / मन्त्र 6

8.50.6

Mantra ID: 8.50.6

पौ॒रो अश्व॑स्य पुरु॒कृद्गवा॑म॒स्युत्सो॑ देव हिर॒ण्ययः॑ । नकि॒र्हि दानं॑ परि॒मर्धि॑ष॒त्त्वे यद्य॒द्यामि॒ तदा भ॑र ॥ (६)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.50.6 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे इंद्र! तुम अश्चों को पूर्ण करने वाले, गायों की संख्या बढ़ाने वाले, सोने के शरीर वाले एवं झरने के समान हो. हमें तुम जो दान देना चाहते हो उसे कोई रोक नहीं सकता, इसलिए हम जब-जब मांगें, तब-तब हमें धन देना. (६)

EN English Translation

O Indra! You are the one who completes the ashes, increases the number of cows, has a gold body and is like a waterfall. No one can stop the donations you want to give us, so give us money whenever we ask. (6)

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