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ऋग्वेद

Mandal 8 • Sukta 55 • Mantra / Rik 12

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 8 • सूक्त 55 • ऋचा / मन्त्र 12

8.55.12

Mantra ID: 8.55.12

पू॒र्वीश्चि॒द्धि त्वे तु॑विकूर्मिन्ना॒शसो॒ हव॑न्त इन्द्रो॒तयः॑ । ति॒रश्चि॑द॒र्यः सव॒ना व॑सो गहि॒ शवि॑ष्ठ श्रु॒धि मे॒ हव॑म् ॥ (१२)

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ऋग्वेद मन्त्र 8.55.12 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे अनेक कर्म करने वाले इंद्र! तुमसे बहुत सी आशाएं संबंधित हैं एवं स्तोता तुम्हें बुलाते हैं. इसलिए तुम हमारे शत्रुओं के यज्ञों का तिरस्कार करके हमारे यज्ञों में आओ. हे अतिशय शक्तिशाली इंद्र! मेरी पुकार सुनो. (१२)

EN English Translation

O Indra, who does many things! There are many hopes related to you and the psalms call you. So you should despise the sacrifices of our enemies and come to our sacrifices. O very powerful Indra! Listen to my call. (12)

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