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ऋग्वेद

Mandal 9 • Sukta 77 • Mantra / Rik 5

Rigveda (ऋग्वेद)

ऋग्वेद • मण्डल 9 • सूक्त 77 • ऋचा / मन्त्र 5

9.77.5

Mantra ID: 9.77.5

चक्रि॑र्दि॒वः प॑वते॒ कृत्व्यो॒ रसो॑ म॒हाँ अद॑ब्धो॒ वरु॑णो हु॒रुग्य॒ते । असा॑वि मि॒त्रो वृ॒जने॑षु य॒ज्ञियोऽत्यो॒ न यू॒थे वृ॑ष॒युः कनि॑क्रदत् ॥ (५)

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ऋग्वेद मन्त्र 9.77.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सब कर्मो के कर्त्ता, कर्मकुशल, रसात्मक, अधिक गुण वाले व अपराजेय सोम इधर- उधर जाते हैं. विपत्ति आने पर सबके मित्र सोम शब्द करते हुए इस प्रकार बरसते हैं, जिस प्रकार घोड़ा घोड़ियों में जाता है. (५)

EN English Translation

The creator of all the karmas, the karma-efficient, the rasatika, the more virtuous and unbeatable Som goes here and there. When there is a calamity, everyone's friends shower the word 'Som' in this way, just as the horse goes into the horses. (5)

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