Popular:

कठोपनिषद् • वल्ली 6, मन्त्र 4

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 6 • मन्त्र 4
ईश्वरज्ञानके बिना पुनर्जन्मप्राप्ति

Katha Upanishad (Kathopanishad) 6.4

Mantra: 6.4 [Kathopanishad_6.4]

इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक्शरीरस्य विस्रसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥

卐

HinduText AI से इस उपनिषद मन्त्र का ब्रह्मज्ञान समझें

उपनिषद मन्त्र संख्या 4 का आध्यात्मिक रहस्य

卐 AI से समझें

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

यदि इस देहमें इसके पतनसे पूर्व ही [ब्रह्मको] जान सका तो
बन्धनसे मुक्त होता है यदि नहीं जान पाया तो इन जन्म-मरणशील
लोकोंमें वह शरीरभावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है ॥ ४ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 इह जीवन्नेव चेद्यद्यशकत श्क्नोति शक्तः सञ्जानात्येतद्भय- कारणं ब्रह्म बोद्धुमवगन्तुं प्राक्पूर्वं शरीरस्य विस्रसोऽध्वंसना- त्यतनात्संसारबन्धनाद्विमुच्यते । 【भाष्यार्थ】 यदि इस देहमें अर्थात् जीवित रहते हुए ही शरीरका पतन होनेसे पूर्व साधक पुरुषने इन सूर्यादिके भयके हेतुभूत ब्रह्मको जान लिया तो वह संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है; और यदि उसे न जान सका तो 【शाङ्करभाष्यम्】 न चेदशकद्बोद्धुं ततः अनवबोधात्सर्गेषु सृज्यन्ते येषु स्रष्टव्याः प्राणिन इति सर्गाः पृथिव्यादयो लोकास्तेषु सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय शरीरभावाय कल्पते समर्थो भवति शरीरं गृह्णातीत्यर्थः । तस्माच्छरीरविस्रंसनात्प्रागात्मबोधाय यत्न आस्थेयः ॥ ४ ॥ 【भाष्यार्थ】 उसका ज्ञान न होनेके कारण वह सर्गोंमें जिनमें स्रष्टव्य प्राणियोंकी रचना की जाती है उन पृथिवी आदि लोकोंमें शरीरत्व—शरीरभावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है अर्थात् शरीर ग्रहण कर लेता है। अतः शरीरपातसे पूर्व ही आत्मज्ञानके लिये यत्न करना चाहिये ॥ ४ ॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 यस्मादिहैवात्मनो दर्शनम् आदर्शस्थस्येव मुखस्य स्पष्ट- मुपपद्यते न लोकान्तरेषु ब्रह्मलोकाद् अन्यत्र, स च दुष्प्रापः, कथम्? इत्युच्यते— 【भाष्यार्थ】 क्योंकि जिस प्रकार दर्पणमें मुखका प्रतिबिम्ब स्पष्ट पड़ता है उसी प्रकार इस (मनुष्यदेह)-में ही आत्माका स्पष्ट दर्शन हो सकता है। इसमें वह जैसा स्पष्टतया अनुभव होता है वैसा ब्रह्मलोकको छोड़कर और किसी लोकमें नहीं होता और उसका प्राप्त होना अत्यन्त कठिन है; सो किस प्रकार ? इसपर कहते हैं—
卐 HinduText AI