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Katha Upanishad (Kathopanishad) 6.4
इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक्शरीरस्य विस्रसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥
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उपनिषद मन्त्र संख्या 4 का आध्यात्मिक रहस्य
हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
बन्धनसे मुक्त होता है यदि नहीं जान पाया तो इन जन्म-मरणशील
लोकोंमें वह शरीरभावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है ॥ ४ ॥