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Katha Upanishad (Kathopanishad) 6.5
यथादर्शे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥
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उपनिषद मन्त्र संख्या 5 का आध्यात्मिक रहस्य