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कठोपनिषद् • वल्ली 6, मन्त्र 5

Katha Upanishad (Kathopanishad) • कृष्ण यजुर्वेद (Krishna Yajurveda - Katha Shakha)

कठोपनिषद् • वल्ली 6 • मन्त्र 5
स्थानभेदसे भगवद्दर्शनमें तारतम्य

Katha Upanishad (Kathopanishad) 6.5

Mantra: 6.5 [Kathopanishad_6.5]

यथादर्शे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥

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उपनिषद मन्त्र संख्या 5 का आध्यात्मिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस प्रकार दर्पणमें उसी प्रकार निर्मल बुद्धिमें आत्माका [स्पष्ट] दर्शन होता है तथा जैसा स्वप्नमें वैसा ही पितृलोकमें और जैसा जलमें वैसा ही गन्धर्वलोकमें उसका [अस्पष्ट] भान होता है; किन्तु ब्रह्मलोकमें तो छाया और प्रकाशके समान वह [सर्वथा स्पष्ट] अनुभव होता है ॥ ५ ॥

भा शाङ्करभाष्य एवं विस्तृत व्याख्या (Shankaracharya Bhashya & Commentary)

【शाङ्करभाष्यम्】 यथादर्शे प्रतिबिम्बभूतम् आत्मानं पश्यति लोकोऽत्यन्तविविक्तं तथेहात्मनि स्वबुद्धौ आदर्शवन्निर्मलीभूतायां विविक्तम् आत्मनो दर्शनं भवतीत्यर्थः। यथा स्वप्नेऽविविक्तं जाग्रद्वासनोद्भूतं तथा पितृलोकेऽविविक्तम् एव दर्शनमात्मनः कर्मफलोप- भोगासक्तत्वात्। यथा चाप्सु अविभक्तावयवमात्ररूपं परीव ददृशे परिदृश्यत इव तथा गन्धर्वलोकेऽविविक्तमेव दर्शन- मात्मनः। एवं च लोकान्तरेष्वपि शास्त्रप्रामाण्यादवगम्यते। छाया- तपयोरिवात्यन्तविविक्तं ब्रह्मलोक एव एकस्मिन्। स च दुष्प्रापोऽत्यन्तविशिष्टकर्मज्ञान- साध्यत्वात्। तस्मादात्मदर्शनायेहैव यत्नः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ ५॥ 【भाष्यार्थ】 जिस प्रकार लोक दर्पणमें प्रतिबिम्बित हुए अपने-आपको अत्यन्त स्पष्टतया देखता है उसी प्रकार दर्पणके समान निर्मल हुई अपनी बुद्धिमें आत्माका स्पष्ट दर्शन होता है--ऐसा इसका अभिप्राय है। जिस प्रकार स्वप्नमें जाग्रद्वासनाओंसे प्रकट हुआ दर्शन अस्पष्ट होता है उसी प्रकार पितृलोकमें भी अस्पष्ट आत्मदर्शन होता है, क्योंकि वहाँ जीव कर्मफलके उपभोगमें आसक्त रहता है। तथा जिस प्रकार जलमें अपना स्वरूप ऐसा दिखलायी देता है, मानो उसके अवयव विभक्त न हों उसी प्रकार गन्धर्वलोकमें भी अस्पष्टरूपसे ही आत्माका दर्शन होता है। अन्य लोकोंमें भी शास्त्रप्रमाणसे ऐसा ही [अर्थात् अस्पष्ट आत्मदर्शन ही] माना जाता है। एकमात्र ब्रह्मलोकमें ही छाया और प्रकाशके समान वह आत्मदर्शन अत्यन्त स्पष्टतया होता है। किन्तु अत्यन्त विशिष्ट कर्म और ज्ञानसे साध्य होनेके कारण वह ब्रह्मलोक बड़ा ही दुष्प्राप्य है। अतः अभिप्राय यह है कि इस मनुष्यलोकमें ही आत्मदर्शनके लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥ ५॥ 【शाङ्करभाष्यम्】 कथमसौ बोद्धव्यः किं वा तदवबोधे प्रयोजनमित्युच्यते— 【भाष्यार्थ】 उस आत्माको किस प्रकार जानना चाहिये और उसके जाननेमें क्या प्रयोजन है? इसपर कहते हैं—
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