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अथर्ववेद

Kanda 14 • Sukta 1 • Mantra 57

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 14 • सूक्त 1 • मन्त्र 57

14.1.57

Mantra ID: 14.1.57

अ॒हं विष्या॑मि॒मयि॑ रू॒पम॑स्या॒ वेद॒दित्प॑श्य॒न्मन॑सः कु॒लाय॑म् । न स्तेय॑मद्मि॒मन॒सोद॑मुच्ये स्व॒यं श्र॑थ्ना॒नो वरु॑णस्य॒ पाशा॑न् ॥ (५७)

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अथर्ववेद मन्त्र 14.1.57 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

मैं इस के हृदय को जानता हुआ तथा उस के रूप को देखता हुआ अपने से आबद्ध करता हूं. मैं चोरी का काम नहीं करता. मैं स्वयं मन लगा कर तेरे केशों को गूंथता हुआ तुझे वरुण के पाशों से मुक्त करता हूं. (५७)

EN English Translation

I bind to me knowing his heart and seeing his form. I don't steal. I myself, kneading your hair and freeing you from the traps of Varuna. (57)

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