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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 48 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 48 • मन्त्र 2

20.48.2

Mantra ID: 20.48.2

ता अ॑र्षन्ति शु॒भ्रियः॑ पृञ्च॒तीर्वर्च॑सा॒ प्रि॒यः॑ । जा॒तं जा॒त्रीर्यथा॑ हृ॒दा ॥ (२)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.48.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस प्रकार माता जन्म लेने वाले बच्चे को अपने हृदय से लगा लेती है, उसी प्रकार सुंदर स्तुतियां इंद्र को तेज से सुशोभित करती हैं. (२)

EN English Translation

Just as a mother attaches the child born to her heart, so beautiful praises adorn Indra with a sharp ness. (2)

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