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अथर्ववेद

Kanda 20 • Sukta 48 • Mantra 4

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 20 • सूक्त 48 • मन्त्र 4

20.48.4

Mantra ID: 20.48.4

आयं गौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑दन्मा॒तरं॑ पु॒रः । पि॒तरं॑ च प्र॒यन्त्स्व: ॥ (४)

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अथर्ववेद मन्त्र 20.48.4 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

ये सूर्य रूपी इंद्र उदयाचल पर पहुंच गए हैं. इन्होंने पूर्व दिशा में दर्शन दे कर सभी प्राणियों को अपनी किरणों से ढक लिया है. इस के लिए उन्होंने स्वर्ग और अंतरिक्ष को वर्षा के जल से खींच कर व्याप्त कर लिया है. वर्षा का जल अमृत के समान है. उस को दुहने के कारण ही इंद्र को गौ कहा जाता है. (४)

EN English Translation

They have reached Indra Udayachal in the form of the sun. He has covered all beings with his rays by giving darshan in the east direction. For this, they have dragged heaven and space from rainwater and pervaded it. Rainwater is like nectar. Indra is called cow because of milking it. (4)

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