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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 46 • Mantra 2

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 46 • मन्त्र 2

6.46.2

Mantra ID: 6.46.2

वि॒द्म ते॑ स्वप्न ज॒नित्रं॑ देवजामी॒नां पु॒त्रोऽसि॑ य॒मस्य॒ कर॑णः । अन्त॑कोऽसि मृ॒त्युर॑सि॒ । तं त्वा॑ स्वप्न॒ तथा॒ सं वि॑द्म॒ स नः॑ स्वप्न दुः॒ष्वप्न्या॑त्पाहि ॥ (२)

ॐ

शास्त्र जिज्ञासा: इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 6.46.2 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

॥ वैदिक संदर्भ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

हे स्वप्न के अभिमानी देव! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम वरुणानी आदि देव पत्नियों के पुत्र एवं यम के साधन हो, इसलिए तुम अंतक और मृत्यु हो. हे स्वप्न! हम तुझे उसी प्रकार जानते हैं. तू बुरे स्वप्न से उत्पन्न दुःख से हमारी रक्षा कर. (२)

EN English Translation

O proud god of dreams! We know your birth. You varunani etc. are the son of dev wives and the instrument of Yama, so you are eternal and death. O dream! That's how we know you. Protect us from the sorrow caused by nightmares. (2)

शास्त्र जिज्ञासा
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