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अथर्ववेद

Kanda 6 • Sukta 46 • Mantra 3

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 6 • सूक्त 46 • मन्त्र 3

6.46.3

Mantra ID: 6.46.3

यथा॑ क॒लां यथा॑ श॒फं यथ॒र्णं सं॒नय॑न्ति । ए॒वा दुः॒ष्वप्न्यं॒ सर्वं॑ द्विष॒ते सं न॑यामसि ॥ (३)

ॐ

शास्त्र जिज्ञासा: इस वैदिक मन्त्र का अर्थ समझें

अथर्ववेद मन्त्र 6.46.3 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

॥ वैदिक संदर्भ ॥

हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जैसे गाय के खुर आदि दूषित अंगों को काट कर दूर कर देते हैं, जैसे ऋणी मनुष्य साहूकार को धन देता है, उसी प्रकार बुरे स्वप्न से उत्पन्न सभी भयों को मैं उस मनुष्य को देता हूं जो मुझ से द्वेष करता है. (३)

EN English Translation

Just as cow's hoofs etc. cut off the contaminated organs and remove them, just as a indebted man gives money to the moneylender, in the same way, I give all the fears arising out of the nightmare to the man who hates Me. (3)

शास्त्र जिज्ञासा
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