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अथर्ववेद

Kanda 1 • Sukta 27 • Mantra 1

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 1 • सूक्त 27 • मन्त्र 1

1.27.1

Mantra ID: 1.27.1

अ॒मूः पा॒रे पृ॑दा॒क्व॑स्त्रिष॒प्ता निर्ज॑रायवः । तासा॑म्ज॒रायु॑भिर्व॒यम॒क्ष्या॒वपि॑ व्ययामस्यघा॒योः प॑रिप॒न्थिनः॑ ॥ (१)

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अथर्ववेद मन्त्र 1.27.1 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

सांपों की ये इक्कीस जातियां देवों के समान बुढ़ापे से रहित हैं एवं नागलोक में निवास करती हैं. इन सांपों की केंचुली जरायु के समान उन से लिपटी रहती है. सांपों की उस केंचुली के द्वारा हम दूसरों का अहित सोचने वाले शत्रुओं की आंखों को ढकते हैं. (१)

EN English Translation

These twenty-one species of snakes are devoid of old age like gods and live in Naglok. The earthworms of these snakes are wrapped around them like a newborn. Through that earthworm of snakes, we cover the eyes of enemies who think others are harmed. (1)

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