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अथर्ववेद

Kanda 10 • Sukta 1 • Mantra 5

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 10 • सूक्त 1 • मन्त्र 5

10.1.5

Mantra ID: 10.1.5

अ॒घम॑स्त्वघ॒कृते॑ श॒पथः॑ शपथीय॒ते । प्र॒त्यक्प्र॑ति॒प्रहि॑ण्मो॒ यथा॑ कृत्या॒कृतं॒ हन॑त् ॥ (५)

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अथर्ववेद मन्त्र 10.1.5 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

पाप उसे प्राप्त हो, जिस ने पाप किया है. शपथ उसी के पास जाए, जिस ने शपथ की है. मैं कृत्या को इस प्रकार वापस लौटाता हूं कि वह अपने निर्माता का ही विनाश कर दे. (५)

EN English Translation

Sin be received by him who has sinned. The oath should go to the one who has taken the oath. I return Krita in such a way that he destroys his creator. (5)

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