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अथर्ववेद

Kanda 10 • Sukta 3 • Mantra 25

Atharvaveda (अथर्ववेद)

अथर्ववेद • काण्ड 10 • सूक्त 3 • मन्त्र 25

10.3.25

Mantra ID: 10.3.25

यथा॑ दे॒वेष्व॒मृतं॒ यथै॑षु स॒त्यमाहि॑तम् । ए॒वा मे॑ वर॒णो म॒णिः की॒र्तिं भूतिं॒ नि य॑च्छतु । तेज॑सा मा॒ समु॑क्षतु॒ यश॑सा॒ सम॑नक्तु मा ॥ (२५)

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अथर्ववेद मन्त्र 10.3.25 का विस्तृत भावार्थ एवं वैदिक रहस्य

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हि हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)

जिस प्रकार देवों में अमृत एवं सत्य प्रतिष्ठित है, उसी प्रकार वरण वृक्ष से निर्मित यह मणि मुझे कीर्ति और ऐश्वर्य प्रदान करे तथा मुझे तेज और यश से सुशोभित करे. (२५)

EN English Translation

Just as nectar and truth are established in the gods, in the same way, this gem made of varan tree gives me fame and opulence and adorns me with glory and glory. (25)

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